तमन्ना-ए-इश्क लिए,
दिल में फिरा करता हूँ।
ढूंढ़ रहा हूँ उस नज़्म को,
जिससे ख्वाबो में इजहार किया करता हूँ,
आज मुझे मिली वो नज़्म,
पर तमन्ना-ए-इश्क ना रहा।
मुझसे मिली वो इस कदर,
मुझे खुदा पर फज़ल ना रहा।
दिल को देता हूँ तसल्ली ये सोचकर,
कि भंवरा भी फूल का दिवाना ना रहा।